मतदाता सूची से नाम हटाने पर सुप्रीम कोर्ट ने तय किए दिशा-निर्देश

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आज बुधवार को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए एसआईआर प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। अदालत ने माना है कि यह प्रक्रिया संविधान और कानून के अनुरूप है। आसान शब्दों में समझे तो अदालत का मानना है कि एसआईआर कराना चुनाव आयोग का अधिकार है और इससे मतदाता सूची को सही और पारदर्शी बनाए रखने में मदद मिलती है। यह एक वैध और संवैधानिक प्रक्रिया है। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग ने कानून के हिसाब से SIR किया और प्रक्रिया में कोई खामी नहीं है। EC ने अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल नहीं किया। कोर्ट ने यह फैसला बिहार में निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने इस मामले में फैसला सुनाया।

SIR से नागरिकता तय नहीं होती
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार चुनाव आयोग को Representation of the People Act, 1950 की धारा 16 के तहत मतदाता सूची के पुनरीक्षण और संशोधन का अधिकार प्राप्त है। कोर्ट ने कहा कि मामले के विस्तृत विश्लेषण के बाद यह साफ है कि एसआईआर का उद्देश्य वैध और संवैधानिक रूप से उचित है। अदालत के अनुसार, इस प्रक्रिया का मुख्य लक्ष्य मतदाता सूचियों की शुद्धता, पूर्णता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा के अधीन है। अदालत के अनुसार, अगर उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर संदेह पैदा होता है तो चुनाव आयोग उसका नाम मतदाता सूची से हटाने की कार्रवाई कर सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं रह जाता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल मतदान के अधिकार से संबंधित है ना कि नागरिकता तय करने से। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में चुनाव आयोग संबंधित व्यक्ति को उचित ट्रिब्यूनल के पास भेज सकता है। इसके साथ ही किसी भी आधार पर मतदाता सूची से नाम हटाने की कार्रवाई को अंतिम नहीं माना जाएगा, बल्कि यह संबंधित प्राधिकरण के अंतिम फैसल पर निर्भर करेगी। सुनवाई के दौरान अदालत ने कई अहम टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण का अधिकार चुनाव आयोग के पास जरूर है लेकिन यह अधिकार ‘असीमित’ नहीं हो सकता। इस प्रक्रिया को पारदर्शिता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप ही संचालित किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनके मामलों को चुनाव आयोग चार सप्ताह के भीतर नागरिकता संबंधी फैसले के लिए संबंधित प्राधिकरण के पास भेजेगा। अदालत ने कहा कि संबंधित प्राधिकरण ऐसे मामलों में नोटिस जारी करेगा, प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई का पूरा अवसर देगा और विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनाव से पहले दावों पर फैसला करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सक्षम प्राधिकरण किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिक मानता है तो उसका नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल करना अनिवार्य होगा।